क्यों तर्क का प्रभाव मुझपर इतना पड़ गया,
की अपनी संवेदना की अनुभूति करने से मैं डर गया,
क्यों शांति का वचन जो विवेक ने दिया,
वो चेतना की वृद्धि के साथ बेचैनी में बदल गया,
क्यों वो रुचि जो अब तक विकास में रही,
वह विकसित होकर निरर्थक अभिलाषा हो गई,
क्यों गम जो खुशी के पूरक था,
वो समानांतर होकर मुझे उदासीन कर गया,
क्यों चित्त मुझे मेरे जज़्बात से दूर कर रहा,
जब की अज्ञानता में मैने खुशी पाई थी,
क्यों मैं करूं फिर भी यही गलती,
की दिल से मैने चाहा फिर भी मन की बढ़ाई की।