Mon Opusएक काव्य-संग्रह
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इंदौर की बारिश

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संध्या अब समीप थी , बाहर से शोर सुनाई आ रहा था , हटाए जब पर्दे खिड़की पर से , एक सुंदर दृश्य नजर आ रहा था , पंछी तो रोज चहचहाते होंगे , या मेरा होना उन्हें भा रहा था, जो हट चुके थे पर्दे रुख से , स्वयं को प्रकृति के और समीप पा रहा था , यूं तो शोर बहुत बारिश में , पर अब ये शोर कहा समझ आ रहा था, पड़ा जो द्दीटा पड़ कर मुझ पे, मुझे इस सृजन का हिस्सा बता रहा था, पर उसकी गति में अब वह बात नहीं थी, वह शोरगुल अब वापस आ रहा था, वर्षा अब अपने अंतिम चरण में थी, और मैं फिर प्रकृति से दूर जा रहा था।

— h.v.r.c

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