संध्या अब समीप थी ,
बाहर से शोर सुनाई आ रहा था ,
हटाए जब पर्दे खिड़की पर से ,
एक सुंदर दृश्य नजर आ रहा था ,
पंछी तो रोज चहचहाते होंगे ,
या मेरा होना उन्हें भा रहा था,
जो हट चुके थे पर्दे रुख से ,
स्वयं को प्रकृति के और समीप पा रहा था ,
यूं तो शोर बहुत बारिश में ,
पर अब ये शोर कहा समझ आ रहा था,
पड़ा जो द्दीटा पड़ कर मुझ पे,
मुझे इस सृजन का हिस्सा बता रहा था,
पर उसकी गति में अब वह बात नहीं थी,
वह शोरगुल अब वापस आ रहा था,
वर्षा अब अपने अंतिम चरण में थी,
और मैं फिर प्रकृति से दूर जा रहा था।