लड़ो के युद्ध अब अवश्यंभावी हैं,
त्यागो वासनाओ को जो तुम पर हावी है,
अब विलास का भोग उपयुक्त नहीं,
विकल्प कोई विजय के अतिरिक्त नहीं।
पराजय को अब तुम अस्वीकार करो,
सीमित स्थिरता का बहिष्कार करो,
ना रह जाए कोई कमी प्रयास में,
व्यर्थ कार्यों पर धिक्कार करो।
हो शांत चित्त अग्रसर नयन,
एकाग्र मन का हो चयन,
निंद्रा लालसा से हो द्वेष,
कार्य कर्म धर्म एक उद्देश्य।
इन्द्रयम विजित त्वं नरोत्तम,
सर्वत्र अपराजित त्वं सर्वोत्तम,
इस युग का ये कुरु हुआ,
उठो के युद्ध अब शुरू हुआ।