Mon Opusएक काव्य-संग्रह
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भीगती हुई चिता

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भीगती हुई चिता मेरे समक्ष है, जीवन का अभाव यूँ तीव्र न था। कर्म और यौवन मेरा गर्व है, पर अनंत से मिलन तो लक्ष्य न था। इस नदी को मैंने कभी रुकते नहीं देखा, सूखते तो देखा है, पर झुकते नहीं देखा। देखा तो होगा इसने कई शवों को जलते, पर देह से रूह को निकलते नहीं देखा। ये लोग जो बेसुध विलाप कर रहे हैं, किसकी देह के अंत का पश्चाताप कर रहे हैं? मैंने तो आदि से इस सत्य को झुठलाया है, न जाने ऊपर देख किससे वार्तालाप कर रहे हैं। पर मुझे अब वापस लौटना होगा, मंज़िल दूर है, लक्ष्य तक पहुँचना होगा। कर्तव्य-विमुख तो नहीं मैं हरी, मेरे पास आने से पहले तुम्हें सोचना होगा।

— h.v.r.c

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