सांझ मेघ ने उस अंबर से,
एक कंवल को खिलते देखा,
दो नैनों को मिलते देखा,
दो नैनों को मिलते देखा।
न शीत लहर, न गंभीर पवन,
फिर भी कलियों को हिलते देखा,
पर मिले जब दो नवनीत नयन,
मुरझाए को भी खिलते देखा।
बुनी थीं जो कल्पनाएँ अनेक,
उन लम्हों को फिर जीकर देखा,
रहे जो तारे चाँद से बिछड़े,
उन तारों से मिलकर देखा।
पूछे हैं अब देव गगन से,
क्या उसने यह फिर से देखा,
विरह जो अपना काम कर रही,
न किसी ने उनको मिलते देखा।