ये जो मैं हर बात पे सोचने लगता हूं,
क्या तुम्हे भी अपने जैसा मान सकता हूं,
ये जो विचारों की श्रृंखला मेरे मन में बनी है,
क्या ये विप्पत्ति तुम पर भी आन पड़ी है,
ये जो एकाकी मुझे अब भाती नहीं है,
क्या ये बातें तुम्हें भी सताती नहीं है,
ये जो मन ने मुझ पर सितम ढाए है,
क्या तुमसे भी ऐसी दोस्ती निभाए हैं,
ये जो शोक के नगर में मेरा मकां हैं,
क्या तुम्हारा भी यहां कोई समां हैं,
ये जो लोग मुझे अब सताने लगे है,
क्या तुम्हे ये सारी बातें बताने लगे हैं,
ये जो अविद्या को मैने उत्तम जान लिया है,
क्या न जानने को तुमने भी सही मान लिया हैं,
ये जो मूर्खता में सुख प्राप्त होता है,
क्या विवेक के आने से समाप्त होता है,
ये जो चंचलता को न समझ सका हूं,
क्या इसी को रोग कहने लगा हूं,
ये जो अस्त्र चिंतन का उठने लगा है,
क्या मेरे ही देह में चुभने लगा है
ये जो उदासीनता का कम्बल ओढ़ने लगा हूं,
क्या वैराग्य की ओर मुंह मोड़ने लगा हूं,
ये जो मन है इस पर अब विजय हो,
क्या हो, जो मुझसा न कोई अजय हो,