Mon Opusएक काव्य-संग्रह
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तुम

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ये रंग, रूप, ये कपोल, ये केशु, सौंदर्य सुगम, सरल, निरंतर है। पर्वत रोके शीत लहर वर्षा को, मेरा जुनून — वो तो ख़ैर समंदर है। चंचल नयन तुम्हारे, चमक चाँदनी, काया सुदोल, सुदंग आकर्षित है। मैं, अहं, दर्प — सब त्यागे हूँ, मेरा अस्तित्व तुम्हें समर्पित है। सौंदर्य सीमित न स्वरूप तुम्हारा, यह ख़ुद-एतिमादी तुम्हारा श्रृंगार है, खूबसूरत तो तुम हो ही बाकायदा, इस संजीदगी पर हमें ऐतबार है, द्वैत में अब कोई अर्थ न दिखता, राधा-कान्हा — सब एक ही मानूँ। 'मैं' और 'तू' — अब विलुप्त हो रहा, निर्गुण ब्रह्म, अतिरिक्त न जानूँ।

— h.v.r.c

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