ये रंग, रूप, ये कपोल, ये केशु,
सौंदर्य सुगम, सरल, निरंतर है।
पर्वत रोके शीत लहर वर्षा को,
मेरा जुनून — वो तो ख़ैर समंदर है।
चंचल नयन तुम्हारे, चमक चाँदनी,
काया सुदोल, सुदंग आकर्षित है।
मैं, अहं, दर्प — सब त्यागे हूँ,
मेरा अस्तित्व तुम्हें समर्पित है।
सौंदर्य सीमित न स्वरूप तुम्हारा,
यह ख़ुद-एतिमादी तुम्हारा श्रृंगार है,
खूबसूरत तो तुम हो ही बाकायदा,
इस संजीदगी पर हमें ऐतबार है,
द्वैत में अब कोई अर्थ न दिखता,
राधा-कान्हा — सब एक ही मानूँ।
'मैं' और 'तू' — अब विलुप्त हो रहा,
निर्गुण ब्रह्म, अतिरिक्त न जानूँ।