इतना कठोर न था दूसरों पर,
जितना ज़ुल्म खुद पर हैं किया,
तंज़ कसे हैं खुद पर इतने,
शत्रु मानो स्वयं का हुआ,
क्षमा शोभा देत बलवान को,
उदार सदा औरों पर रहा,
पर बात आई जब अपने पर,
तो दुर्बल, निर्बल, कमजोर ही रहा,
समझदारी का जो ढोंग रचा है,
किसको मूर्ख बनावत लाला,
मैं जाने हूं भीतर से तोहे,
यह साम दाम और स्वांग निराला,
उतरो जरा ऊंचे आदर्शों पर से,
सत्य की ज़मीन को जानो,
करो कुछ गलतियां फिर से भोले,
समय है अब भी बात ये मानो।