क्या है सही और गलत की परिभाषा,
क्यों सभी को है सही होने की आशा,
फस गया हूँ मैं भी इस खेल में,
अज्ञानता और अहंकार के असहज मेल में,
स्वयं की सत्यता स्थापित करते करते,
सत्य धुंदला सा गया है ,
चेतना मर गयी है,
चित्त न जाने कहा खो गया है,
और भी राहगीर है यहाँ,
मेँ अकेला नहीं हु इस राह मेँ,
बहुत से लोग झूठे हो चुके है,
इस तरह सच्चा होने की चाह मे,
पूर्णता से सही होना एक निरर्थक अभिलाषा है,
क्युकी सही गलत की सबकी अपनी परिभाषा है।